बात आज की नहीं, बात तो कल की है
बात ये नहीं की क्या है, बात तो ये है की क्या चला गया है
पल वो आज भी जब सामने आता है
न जाने क्यूँ इस समय में विराम लाता है
थम जाती है ये नदी और पवन
और चला जाता है ये मन करने विचरण
महसूस करता हूँ ठंडी हवाएं झील की
और देखता रह जाता हूँ वो आखें नील सी
खो जाना चाहता हूँ मैं इस वक़्त
लेकिन धकेल देती है मुझे एक आवाज़ सख्त
चलते जाना ही जीवन का है नियम
और नहीं है कोई उपाय बस रखना है संयम
खो गया है सब कुछ न जाने कहाँ
छूट गया है वो साथ जिसके साथ मैंने जाना चाहता था वहां
रह गयीं हैं बस सूनी गलियाँ
और मेरे साथ घूमती तन्हाईयाँ
सोचता हूँ सब कुछ, निकलती है इस दिल से एक आह
है एक आस, आएगा वो दिन जब निकलेगी फिर एक वाह
बात आज की नहीं, बात तो कल की है
बात ये नहीं की क्या है, बात तो ये है की क्या चला गया है
*Not my composition. Written by my friend.


