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बीतीं बातें

बीतीं बातें

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बात आज की नहीं, बात तो कल की है
बात ये नहीं की क्या है, बात तो ये है की क्या चला गया है

पल वो आज भी जब सामने आता है
न जाने क्यूँ इस समय में विराम लाता है

थम जाती है ये नदी और पवन
और चला जाता है ये मन करने विचरण

महसूस करता हूँ ठंडी हवाएं झील की
और देखता रह जाता हूँ वो आखें नील सी

खो जाना चाहता हूँ मैं इस वक़्त
लेकिन धकेल देती है मुझे एक आवाज़ सख्त

चलते जाना ही जीवन का है नियम
और नहीं है कोई उपाय बस रखना है संयम

खो गया है सब कुछ न जाने कहाँ
छूट गया है वो साथ जिसके साथ मैंने जाना चाहता था वहां

रह गयीं हैं बस सूनी गलियाँ 
और मेरे साथ घूमती तन्हाईयाँ

सोचता हूँ सब कुछ, निकलती है इस दिल से एक आह
है एक आस, आएगा वो दिन जब निकलेगी फिर एक वाह

बात आज की नहीं, बात तो कल की है
बात ये नहीं की क्या है, बात तो ये है की क्या चला गया है

 

*Not my composition. Written by my friend.

नज़र

नज़र

शबनमी रात की भीगी चांदनी में
अँधेरे कमरे में चाँद की रौशनी में नहायी मैं
शर्वरी की कालिमा को चीरती घड़ी की टिक-टिक में
कर रही हूँ इंतज़ार, तुम्हारे खयालों में समायी मैं…

कितने दिनों से आस लगाये हूँ मैं
कि एक दिन तुम्हारे होठों को छूकर देखूं
कितने दिनों से आस लगाये हूँ मैं
कि एक दिन तुम्हे अपने सीने में छुपा लूं

पर अब वह इंतज़ार सहा नहीं जाता
तुम्हारे खयाल अब भुलाये नहीं भूलते
तुम्हारे होठों को छूने की चाह बस चाह हैं
तुम्हे सीने में छुपाना भी अब दुष्वार हैं

किस्मत ने एक दिन हम दोनों को मिलाया
नज़रों से नज़रें मिली और दिल की धड़कने बढ़ने लगी
दस बहाने कर दिल आँख चुराने लगा
मैंने उसकी आँखों में गौर से देखा
उसके हाथ को अपने हाथों में लिया और कहा…
तुम्हारी नज़रें वह आईना है
जिसमे मैं खुद की परछाई देखती हूँ
और करीब से निहारने पर
मैं अपनी आँखों में तुम्हारे लिए भरा प्यार देखती हूँ…

अब इंतज़ार ख़त्म हो गया
वह खयाल अब हकीकत बन गए
होंठ से होंठ मिल गए
और दिल ही दिल में प्यार समा गया